पीकू (2015)


10 साल बीत गए लेकिन जब भी ‘पीकू’ देखते हैं, एक हल्की मुस्कान और गहरी सोच दोनों साथ आ जाती हैं। शूजीत सरकार की यह फिल्म, कोई बड़ा ड्रामा नहीं करती, कोई बेमिसाल एक्शन नहीं है, बस एक सीधी-सी, घरेलू सी कहानी है, लेकिन जितनी सादा है, उतनी ही असरदार भी।

‘पीकू’ (दीपिका पादुकोण) दिल्ली में एक आर्किटेक्ट है और अपने उम्रदराज, जिद्दी और कब्ज़ की बीमारी से ग्रस्त पिता भास्कर बनर्जी (अमिताभ बच्चन) की देखभाल करती है। कहानी उनके दिल्ली से कोलकाता तक की एक कार यात्रा के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसमें ड्राइवर राणा (इरफान खान) भी शामिल हो जाता है।

सड़क पर निकली ये यात्रा असल में एक भीतर की यात्रा है, रिश्तों को समझने, सीमाओं को स्वीकारने, और परिवार की उलझनों को अपनाने की।

फिल्म में कब्ज़ एक कॉमेडिक एलीमेंट लगता है, लेकिन यही शरीर की रुकावट असल में जीवन के ठहराव का प्रतीक बन जाती है। भास्कर बाबू का लगातार कब्ज़ की बात करना, उनके भीतर के डर और असुरक्षा का बाहरी रूप है, बूढ़ा होने का डर, अकेले छूट जाने का डर, और अपनी बेटी को खो देने का डर।




वहीं पीकू जो बाहर से मजबूत और सख्त है भीतर से उतनी ही संवेदनशील है। वह अपने करियर और पर्सनल स्पेस की बलि देती है सिर्फ इसलिए कि उसके पापा को किसी और पर भरोसा नहीं।

इरफान का किरदार राणा इस रिश्ते में हवा की तरह आता है, ना ज़्यादा बोलता है, ना ज़्यादा करता है, लेकिन उसके शांत और स्थिर व्यक्तित्व से ही पीकू और भास्कर के बीच की ज़िद पिघलने लगती है।

एक दार्शनिक अंत

फिल्म का अंत बहुत साधारण है , कोई भारी-भरकम संवाद नहीं, कोई आंसुओं की बाढ़ नहीं। भास्कर एक सुबह उठते हैं, साइकिल चलाते हैं, और चुपचाप चले जाते हैं। बिना किसी ड्रामे के।

लेकिन यहीं फिल्म सबसे गहरी बात कह जाती है —

"जब एक पिता जाता है, तो वो खाली कुर्सी नहीं छोड़ता, वो पूरी ज़िंदगी का आइना छोड़ जाता है।"

भास्कर के जाने के बाद पीकू थोड़ी और मुस्कुराती है, थोड़ी और खुलकर जीती है। जैसे जीवन कह रहा हो, छोड़ने की प्रक्रिया ही अपनाने का रास्ता बनती है।

बस इतना ही !!










फिर से, 
 
अमिताभ बच्चन और इरफ़ान ख़ान की अदाकारी पर कुछ कहने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि उनका अभिनय "देखने" की चीज़ नहीं, "महसूस" करने की बात है। भास्कर बनर्जी जैसे किरदार को कोई और इस तरह निभा ही नहीं सकता था ,वह simultaneously चिढ़ाने वाला और दयनीय, हास्यास्पद और गम्भीर है, और इरफ़ान, वो हमेशा की तरह बिना ज़ोर डाले, अपने मौन में ही पूरा संवाद रच देते हैं
दीपिका पादुकोण इस फिल्म में केवल एक बेटी नहीं, एक इंसान हैं — थकी हुई, मजबूर, लेकिन दृढ़। यह उनकी परिपक्वता की मिसाल है, और हमें भरोसा है कि The Interns जैसी अगली फिल्मों में हम उन्हें और ऊँचाइयों पर देखेंगे।   



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