फ़िल्म की कहानी कुछ आम, आज़ाद-ख़याल युवाओं के इर्द-गिर्द घूमती है, जो राजनीति और सिस्टम से दूर रहना चाहते हैं। लेकिन जैसे-जैसे वे भारत के क्रांतिकारियों की कहानी को “री-लाइव” करते हैं, वैसे-वैसे उन्हें एहसास होता है कि आज़ादी केवल इतिहास नहीं, ज़िम्मेदारी भी है।
रंग दे बसंती यह बताती है कि जब सिस्टम सुनना बंद कर दे, तब चुप रहना भी एक अपराध बन जाता है।
आज जब हम रंग दे बसंती को दोबारा देखते हैं, तो वह रोमांचक नहीं, बल्कि डरावनी लगती है, क्योंकि फ़िल्म में दिखाई गई चेतावनियाँ आज हमारी रोज़मर्रा की सच्चाई बन चुकी हैं। उस समय यह एक साहसी कल्पना थी, आज यह एक कड़वा यथार्थ है। फ़िल्म जिन सवालों को उठाती है, सिस्टम की जवाबदेही, सत्ता की संवेदनहीनता और आम नागरिक की बेबसी, वे आज भी वैसे ही खड़े हैं, शायद और भी मज़बूत होकर।
फ़िल्म का सबसे बड़ा योगदान यह है कि यह हमें यह भ्रम तोड़ने पर मजबूर करती है कि “कुछ नहीं बदला जा सकता।” यह युवाओं को यह एहसास कराती है कि निष्क्रियता भी एक राजनीतिक फैसला है। चुप रहना तटस्थता नहीं है, वह अन्याय के पक्ष में खड़ा होना है। रंग दे बसंती यह सिखाती है कि जब आप सवाल नहीं पूछते, तब आप खुद को सिस्टम के हवाले कर देते हैं।
आज के दौर में विरोध को अव्यवस्था कहा जाता है, असहमति को दुश्मनी। सोशल मीडिया पर भावनाएँ तो बहुत हैं, लेकिन ज़मीन पर खड़े होने का साहस कम होता जा रहा है। “हैशटैग एक्टिविज़्म” ने असली जोखिम को बदल दिया है। लोग पोस्ट करते हैं, लेकिन खड़े नहीं होते। रंग दे बसंती की पीढ़ी ने खड़े होकर कीमत चुकाई थी, आज की पीढ़ी अक्सर कीमत से डरती है।
यह फ़िल्म यह भी दिखाती है कि क्रांति हमेशा बड़े नारों से नहीं शुरू होती। वह छोटे-छोटे नैतिक फैसलों से जन्म लेती है, सच के साथ खड़े होने से, गलत के खिलाफ बोलने से, और व्यक्तिगत आराम को सामूहिक भलाई पर कुर्बान करने से। यही वजह है कि यह फ़िल्म आज भी असहज करती है, क्योंकि यह हमसे पूछती है कि हमने आख़िरी बार कब सही के लिए असुविधा चुनी थी।
बीस साल बाद, रंग दे बसंती एक क्लासिक नहीं, एक आरोप बन चुकी है, हम पर, हमारे समाज पर, और हमारी चुप्पी पर। यह हमें याद दिलाती है कि आज़ादी एक बार नहीं मिलती; उसे हर पीढ़ी को फिर से कमाना पड़ता है। और शायद सबसे दुखद सच्चाई यही है कि आज हम उसे दोबारा कमाने के लिए उतने बेचैन नहीं हैं, जितने कभी हुआ करते थे।
इसलिए यह फ़िल्म आज भी सिर्फ़ देखी नहीं जानी चाहिए महसूस की जानी चाहिए। क्योंकि अगर यह फ़िल्म आज भी हमें असहज नहीं करती, तो शायद हमने असहज होना ही छोड़ दिया है। और जब समाज असहज होना बंद कर देता है, तब बदलाव मर जाता है।
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