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1857 की जंग-ए-आज़ादी के वक़्त मेरठ से दिल्ली आए हुए सैनिकों ने आखिरी मुग़ल बादशाह ज़फ़र से मुलाक़ात की और कहा कि आप हमारी बगावत का नेतृत्व करे। बादशाह ने कि 'मेरे पास तो खज़ाना भी नहीं कि तुम्हें तनख्वाह दे सकूँ और न ही कोई सेना जिससे तुम्हारी मदद के लिए क़दम बढ़ा सकूँ।' बाग़ी सैनिकों ने आश्वासन दिया कि हमें आपसे कुछ नहीं चाहिए। बहादुर शाह क्रांतिकारियों के नेता बन गए, तोपखाने ने सलामी दी। बादशाह सलामत जिंदाबाद के नारे गूंजने लगे।
शहर में 261 मस्जिदों से आती अजान की आवाज़ और 186 मंदिरों में बजती घण्टियों की ध्वनि एकता की प्रतीक थीं।
हिन्दुस्तान के बादशाह ने अपनी अवाम से गुज़ारिश की 'हिन्दुस्तान के हिन्दुओ और मुस्लमानो उठो भाइयो उठो। ख़ुदा ने जितनी बरकतें इंसान को अता की हैं उनमें आज़ादी सबसे कीमती बरक़त है, क्या ये ज़ालिम जिसने धोखा देकर हमसे ये बरक़त छीन ली है, क्या हमेशा के लिए हमसे महरूम रख सकेगा, नहीं-नहीं इन फिरंगियों ने इतने जुल्म किये हैं कि उनके गुनाहों का प्याला लबरेज हो चुका है। यहाँ तक कि उनमें अब हमारे पाक मज़हब को खत्म करने की नापाक ख़्वाहिश भी पैदा हो गयी है। क्या तुम अब भी ख़ामोश बैठे रहोगे। ख़ुदा ये नहीं चाहता कि तुम ख़ामोश रहो क्योंकि उसने हिन्दुओं और मुस्लमानों के दिलों में अंग्रेज को अपने मुल्क से बाहर निकालने का ज़्ज़्बा पैदा कर दिया है और ख़ुदा के फ़ज़ल से और तुम लोगों की बहादुरी से जल्दी ही अंग्रेज को इतनी करारी शिकस्त मिलेगी कि हमारे मुल्क में उनका ज़रा सा भी निशान न रह जाएगा। हमारी इस फ़ौज में छोटे और बड़े की तमीज भुला दी जायेगी और सबके साथ बराबरी का सुलूक किया जायेगा। क्योंकि इस पाकजंग में जितने लोग अपने धर्म और मजहब की हिफाजत के लिए तलवार खीचेंगे सब एक साथ मारूफ़ होंगे उनमें छोटे और बड़े का कोई भेद न होगा।"
अंग्रेज़ों का कोई दाव कामयाब न हो, इस बार ईद के मौके पर बादशाह के हुक्म से गौकुशी प्रतिबंधित कर दी गयी ताकि गाय में आस्था रखने वाले हिंदुमन में बैर नहीं पनपे। हालांकि ये प्रतिबंध कोई पहली बार नहीं हुआ था, कभी बादशाह अकबर भी इसी हिन्दुस्तानी आस्था को संभालने के लिए आगे बढ़े थे ताकि आपसी सद्भाव कायम रहे, तमाम कोशिशों का अंजाम फिर भी अच्छा नहीं रहा।
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क़दमे के दौरान ज़फ़र के सामने थाल लाया गया। हडसन ने तश्त पर से ग़िलाफ़ हटाया। कोई और होता तो शायद ग़श खा जाता या नज़र फेर लेता। लेकिन बहादुर शाह ज़फर ने ऐसा कुछ नहीं किया। थाल मे रखे जवान बेटों के कटे सिरों को इत्मीनान से देखा। हडसन से मुख़ातिब हुए और कहा :- ‘वल्लाह… नस्ले ‘तैमूर’ के चश्मो चराग़ मैदाने जंग से इसी तरह सुर्ख़रू होकर अपने बाप के सामने आते हैं। हडसन तुम हार गए और हिंदुस्तान जीत गया।’
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लगता नही है दिल मेरा उजड़े दियार में
और
कितना बदनसीब है ज़फर दफ़न के लिए
7 नवंबर 1862 को बादशाह की खादमा परेशानी के हाल में नेल्सन के दरवाज़े पर दस्तक देती है , बर्मी खादिम आने की वजह पूछता है ..खादमा बताती है बादशाह अपनी ज़िन्दगी के आखिरी साँस गिन रहा है गैराज की खिड़की खोलने की फरमाईश ले कर आई है .... बर्मी ख़ादिम जवाब में कहता है ... अभी साहब कुत्ते को कंघी कर रहे है .. मै उन्हें डिस्टर्ब नही कर सकता .... ख़ादमा जोर जोर से रोने लगती है ... आवाज़ सुन कर नेल्सन बाहर आता है ... ख़ादमा की फरमाइश सुन कर वो गैराज पहुँचता है .....!
17 अक्टूबर 1858 को #बाहदुर_शाह_ज़फर मकेंजी नाम के समुंद्री जहाज़ से रंगून पहुंचा दिए गये थे ,शाही खानदान के 35 लोग उस जहाज़ में सवार थे ,कैप्टेन नेल्सन डेविस रंगून का इंचार्ज था , उसने बादशाह और उसके लोगों को बंदरगाह पर रिसीव किया और दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी हुकूमत के बादशाह को लेकर अपने घर पहुंचा !
बहादुर शाह ज़फर कैदी होने के बाद भी बादशाह थे, इसलिए नेल्सन परेशान था, उसे ये ठीक नही लग रहा था कि बादशाह को किसी जेल ख़ाने में रखा जाये ... इसलिए उसने अपना गैराज खाली करवाया और वहीँ बादशाह को रखने का इंतज़ाम कराया !
बहादुर शाह ज़फर 17 अक्टूबर 1858 को इस गैराज में गए और 7 नवंबर 1862 को अपनी चार साल की गैराज की जिंदगी को मौत के हवाले कर के ही निकले , बहादुर शाह ज़फर ने अपनी मशहुर ग़ज़ल इसी गैराज में लिखा था ....
लगता नही है दिल मेरा उजड़े दियार में
किस की बनी है है आलम न पायेदार में
और
कितना बदनसीब है ज़फर दफ़न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिले कुए यार में..
7 नवंबर 1862 को बादशाह की खादमा परेशानी के हाल में नेल्सन के दरवाज़े पर दस्तक देती है , बर्मी खादिम आने की वजह पूछता है ..खादमा बताती है बादशाह अपनी ज़िन्दगी के आखिरी साँस गिन रहा है गैराज की खिड़की खोलने की फरमाईश ले कर आई है .... बर्मी ख़ादिम जवाब में कहता है ... अभी साहब कुत्ते को कंघी कर रहे है .. मै उन्हें डिस्टर्ब नही कर सकता .... ख़ादमा जोर जोर से रोने लगती है ... आवाज़ सुन कर नेल्सन बाहर आता है ... ख़ादमा की फरमाइश सुन कर वो गैराज पहुँचता है .....!
बादशाह के आखिरी आरामगाह में बदबू फैली हुई थी ,और मौत की ख़ामोशी थी ... बादशाह का आधा कम्बल ज़मीन पर और आधा बिस्तर पर ... नंगा सर तकिये पर था लेकिन गर्दन लुढ़की हुई थी ..आँख को बहार को थे .. और सूखे होंटो पर मक्खी भिनभिना रही थी .... नेल्सन ने ज़िन्दगी में हजारो चेहरे देखे थे लेकिन इतनी बेचारगी किसी के चेहरे पर नही देखि थी .... वो बादशाह का चेहरा नही बल्कि दुनिया के सबसे बड़े भिखारी का चेहरा था ... उसके चेहरे पर एक ही फ़रमाइश थी .... आज़ाद साँस की !
हिंदुस्तान के आखिरी बादशाह की ज़िन्दगी खत्म हो चुकी थी ..कफ़न दफ़न की तय्यारी होने लगी ..शहजादा जवान बख़्त और हाफिज़ मोहम्मद इब्राहीम देहलवी ने गुसुल दिया ... बादशाह के लिए रंगून में ज़मीन नही थी ... सरकारी बंगले के पीछे खुदाई की गयी .. और बादशाह को खैरात में मिली मिटटी के निचे डाल दिया गया.
उस्ताद हाफिज़ इब्राहीम देहलवी के आँखों को सामने 30 सितम्बर 1837 के मंज़र दौड़ने लगे ...जब 62 साल की उम्र में बहादुर शाह ज़फर तख़्त नशीं हुआ था ...वो वक़्त कुछ और था ..ये वक़्त कुछ और था ....इब्राहीम दहलवी सुरह तौबा की तिलावत करते है , नेल्सन क़बर को आखिरी सलामी पेश करता है ...और एक सूरज गुरूब हो जाता है !
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लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में
किसकी बनी है आलम-ए-नापायेदार में
बुलबुल को पासबाँ से न सैयाद से गिला
क़िस्मत में क़ैद लिखी थी फ़स्ल-ए-बहार में
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में
इक शाख़-ए-गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमाँ
काँटे बिछा दिये हैं दिल-ए-लालाज़ार में
उम्र-ए-दराज़ माँगके लाए थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गए, दो इन्तज़ार में
दिन ज़िन्दगी के ख़त्म हुए शाम हो गई
फैला के पाँव सोएँगे कुंज-ए-मज़ार में
कितना है बदनसीब "ज़फ़र″ दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
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बहादुर शाह ज़फ़र
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