लुटेरा (२०१३)


कोई कारण नहीं ढूंढ पा रहे हैं तो अमित त्रिवेदी के लिए देखिये, गाने पसंद न आएं  (उसकी अपेक्षा कम है, न के बराबर है) तो बैकग्राउंड म्यूजिक के लिए देखिये, हंस ज़िम्मर के स्तर पर पहुंचे हैं त्रिवेदीजी, मेरा कोई मन नहीं है अमित के काम की तुलना करने का, पर संदर्भ बता देने से पाठक का काम आसान हो जाता है



पूरी फिल्म ओ-हेनरी की विश्व प्रसिद्द कहानी "दी लास्ट लीफ" पर आधारित है, और भारतीय पृष्टभूमि पर प्लॉट  चुना गया है बंगाल, क्यों न हो बंगाल के पास किरदारों की कोई कमी है भी नहीं, कभी भी नहीं | खैर, प्लॉट पर वापस आते हैं, १९४८ के लगभग का समय है ,चौधुरी साहब (बरुन चंदा) की ज़मींदारी मरने के स्थिति में है, अँगरेज़ भारत से जा चुके हैं, जमींदारों को अंग्रेज़ों का दोस्त समझा जा रहा है, एक बिन माँ की अस्थमेटिक बेटी है पाखी (सोनाक्षी सिन्हा), वरुण (रणवीर सिंह) और उनके मित्र देवदास (विक्रांत मस्सी)पुरातत्व की खुदाई करने आते हैं और वरुण पाखी के होकर रह जाते हैं|

वरुण के आने का असली मकसद चौधुरी साहब की पुश्तैनी राधा-कृष्णा की मूर्ति चुराना है, जिसकी अंतराष्ट्रीय बाजार में अच्छी कीमत है, इसी बीच वरुण और पाखी के कुछ प्रेम प्रसंग हैं जहाँ पाखी और वरुण पेंटिंग सीखने के बहाने मिलते हैं, पाखी वरुण को पत्ती पेण्ट करने से पेंटिंग करना सिखाना शुरू करती है, प्रेम पाखी के पंख पसारता है, वरन वरुण अभी भी दुबका है | वरुण के चच्चा (आरिफ ज़कारिया) जो असली लुटेरे हैं वरुण को आगाह करते हैं कि उसे प्रेम की आज्ञा और सहूलियत नहीं है, और भावनाओ के जाल में फ़साने का सफल प्रयास करते हैं, अक्सर पके किशोर और नए युवा केवल इसी तरह अफ़सोस से भरे प्रौढ़ बनाये जाते हैं | वरुण सगाई के दिन पाखी और जमींदार साहब का दिल तोड़कर, मूर्तियां लेकर भाग जाता है |

इंटरमिशन के बाद कहानी डलहौजी से शुरू है और लगभग ६ साल बाद समय चित्रित है, जमींदार साहब सदमे से मर चुके हैं और पाखी अपने प्रचंड अस्थमा के साथ उपन्यास लिखने में व्यस्त है, नौकरानी श्यामा (दिव्या दत्ता) देखभाल के साथ ,खाना भी बनाती है और राज़ भी छुपाती है| वरुण का मूर्ति चुराने के सिलसिले में वहीँ आना  होता है और वो पाखी के ही बंगले में कमरा किराये पर लेता है, पुलिस मुठभेड़ में देवदास मारा जाता है और वरुण बुरी तरह घायल होता है |

वरुण पाखी को, और पाखी को वरुण पुनः घायल और मरणासन्न मिलते हैं, अब प्रतियोगिता है कौन किसे बचायेगा, पाखी एक पेड़ की पत्तियों के गिरने से अपनी सांसों को बांध चुकी होती है और आखरी पट्टी के गिरने पर ही गिरने का प्रण करती है, वरुण पाखी द्वारा सिखाये गए पेड़ की पत्ती बनाने की कला को उपयोग में लाकर एक कृत्रिम पत्ती बना कर पेड़ पर लगा देता है जो पाखी का जीवन सुनिश्चित करती है | उसी समय वरुण/आत्मानंद त्रिपाठी इंस्पेक्टर KN सिंह (आदिल हुसैन) द्वारा चिरयात्रा पर प्रस्थान करवाए जाते हैं | फिल्म यहीं समाप्त होती है |


विक्रमादित्य मोटवाने क्रन्तिकारी निर्देशक हैं, और अमित त्रिवेदी का संगीत उनका ईंधन, कुल मिलकर एक बेहतरीन फिल्म, उनके बेहतरीन बैकग्राउंड म्यूजिक की और तारीफ क्या करूँ जबकि पूरा लेख ही वहीँ से शुरू किया है, कथा और पटकथा दोनों कमाल हैं, सोनाक्षी सिन्हा ने शायद उनके जीवन का सर्वश्रेठ दे दिया है |

लूटेरा आशा की कहानी है, प्रेम फिर वियोग, मिलन और फिर प्रेमवियोग की कहानी, जहाँ अपने जीवन की हर समस्या का दोष वरुण पर मढ़ती पाखी को वरुण ही नया जीवन दे जाता है, असली ज़िंदगी में भी ऐसा ही होता है | कई बार असली समस्या शायद आप स्वयं हैं | बस इतना ही, लूटेरा अवश्य देखें और प्रेम में लुटें , सार्थक ३ घंटे |




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