मित्र के अनुरोध पर श्रीफैज़ अहमद फैज़ की नज़्म का सरल हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है, जहाँ त्रुटि प्रतीत हो सूचित अवश्य करें।
मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न माँग
(मुझसे पहले जैसे प्रेम की मांग न कर)
मैंने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर का झगड़ा क्या है
तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर का झगड़ा क्या है
(मैंने समझा था की जब तक आप है दीप्तिमान है,
और आपसे दूर रहने के दुःख को मैंने सबसे बड़ा दुःख पाया )
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है?
(तेरी सूरत से ही बहारों में बहार आने की प्रेरणा मिलती हैं
तुम्हारी आँखों के सिवाय दुनिया में कुछ सुन्दर है भी नहीं)
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए
यूँ न था, मैंने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
( तुम को मिल जाओ तो भाग्य भी मेरे आगे झुक जायेऐसा सिर्फ चाहा था, पर चाहा था ये हो जाये )
मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न माँग
(मुझसे पहले जैसे प्रेम की मांग न कर)
और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं, वस्ल की राहत के सिवा
( और भी दुःख हैं दुनिया में प्रेम के दुःख के सिवा
और भी खुशियां हैं तुमसे मिलने के सिवा)
अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म
रेशम-ओ-अतलस-ओ-कमख़्वाब में बुनवाए हुए
( अनंत काल से चलते हुए ये बर्बर क्रम को रेशम-ओ-अतलस-ओ-कमख़्वाब में बुनवाए हुए
यदि मोटे रेशम लपेटा जाये )
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुए, ख़ून में नहलाए हुए
ख़ाक में लिथड़े हुए, ख़ून में नहलाए हुए
(ऐसे ही कुछ लोग बिकते हैं बाजार में
धूल से सने हुए, रक्त से नहाये हुए)
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे!
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे!
(फिर भी मैं लौट हूँ इस मृत्युलोक में,
और अब भी तुम उतनी ही खूबसूरत हो )
और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
( और भी दुःख हैं दुनिया में प्रेम के दुःख के सिवा
और भी खुशियां हैं तुमसे मिलने के सिवा)
मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न माँग
(मुझसे पहले जैसे प्रेम की मांग न कर)
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