शाहिद (२०१२)

हंसल मेहता को किसी ने तैरना नहीं सिखाया वो कई बार डूबे, कई बार मरे, फिर इतने हलके हो गए कि दरिया ने ही बहार फेक दिया, संजीव कपूर का ज़ीटीवी वाला शो "खाना खज़ाना" याद है, और अभी की फिल्म "अलीगढ़", दोनों का निर्देशन हंसल ने ही किया है, आप अंदाज़ा लगा सकते हैं, कितने चतुर और पारदर्शी तैराक बन गए हैं ये महाशय, खैर ये ब्लॉग शाहिद पर है और अपनी ओर से मैं पूरा ध्यान इसी ओर रखूँगा, हालाँकि हंसल ने कोई कसर नहीं छोड़ी है मुझे भटकाने की

शाहिद अनसुलझी हुई कहानी है, कई उत्तर आपको ही देने होंगे इसे देखने के बाद, किशोरावस्था के दिवास्वप्न जब वास्तविक धरातल से टकराते हैं तो उनका टूटना ही लगभग तय ही होता है, किन्तु कुछ कुमार इन सपनो को एक बार और धरा पर जोर से पटकना चाहते हैं ताकि धरा टूटे सपने नहीं, शाहिद भी एक ऐसे ही किशोर की कहानी है, इस उम्र के हर दर्द के निशान भी गहरे ही होते हैं। 

      




शाहिद, इस कहानी का नायक (राजकुमार राव) जो १९९२ के साम्प्रदायिक दंगो के बाद पूरे तंत्र से नाराज़ है, वो POK भाग जाता है और बदला चाहता है किससे ये नहीं पता उसे, यहाँ के वास्तविक और डरावने नज़ारे फिर उसे भारत की ओर खींचते हैं और वो वापस अपने घर आता है फिर से पढाई करने के लिए, पुलिस को किसी आतंकवादी की डायरी में शाहिद का नंबर मिलता है, और उसे अरेस्ट कर उस पर TADA (Terrorist and Disruptive Activities (Prevention) Act) लगा दिया जाता है, उसे जेल जाना पड़ता है जहाँ से उसका नया जीवन शुरू होता है।

तिहाड़ जेल में डॉ सक्सेना (युसूफ हुसैन) और गुलाम नबी (केके मेमन) की सलाह उसे कट्टरपंथियों से बचाती है, और आगे पढ़ने के लिए प्रेरित करती है, लगभग ५ साल जेल में रहकर शाहिद को बाइज़्ज़त बरी कर दिया जाता है, यहाँ से वो मुंबई वापस आता है और लॉ की पढाई पूरी करता है, कुछ महीने सीनियर लॉयर मकबूल मेमोन (तिग्मांशु धूलिया) के साथ कुछ महीने प्रैक्टिस करने के बाद शाहिद की यथार्थवादिता उसे वहां टिकने नहीं देती,  वो अपने भाई (मोहम्मद अय्यूब) से लोन लेकर खुद की प्रैक्टिस शुरू करता है, असली शाहिद यहां से शुरू होता है, शाहिद हर उस संदिग्ध (या समाज के लिए आतंकवादी ) का केस लड़ना चाहता है जिसे केवल संदेह के स्तर पर अरेस्ट कर लिया गया है, वो ऐसा करता है और अभूतपूर्व रूप से सफल होता है, उसकी लड़ाई उसकी हत्या के साथ समाप्त होती है।

शाहीद की लड़ाई न्यायव्यवस्था से कम और लोकव्यवस्था से ज्यादा मालूम पड़ती है, जिसे भी एक बाद आतंकवादी बनाकर अरेस्ट कर लिया गया, न्याय जो भी हो, समाज उसे कभी अपनाता नहीं, यह शाहिद का बड़ा दर्द है , विश्वास कीजिये २ महीने से इस ब्लॉग को पूरा करने की कोशिश में हूँ और आज तय किया है की समाप्त करके ही उठूंगा, शाहिद जब भी देखता हूँ वो कहानी मुझे झकझोर देती है, अंदर से हिला देती है, आपको मजबूर करती है कि आप भी अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुने और फैसले करें, फिल्मांकन में शाहिद के ऑफिस में रॉय ब्लैक का भी जिक्र है, प्रभलीन सन्धु ने मानस पटेल पर छोटे किरदार में ही सही पर अपनी स्पष्ट रेखा बना दी है, और कुछ नहीं है लिखने के लिए...




“By showing me injustice, he taught me to love justice. By teaching me what pain and humiliation were all about, he awakened my heart to mercy.  Through these hardships, I learned hard lessons. Fight against prejudice, battle the oppressors, support the underdog. Question authority, shake up the system, never be discouraged by hard times and hard people.  Embrace those who are placed last, to whom even bottom looks like up.  It took me some time to find my mission in life – that of a civil servant. But that ‘school’, and that teacher put me on my true path.  I will never be discouraged. Even thorns and thistles can teach you something, and lead to success.”. - Roy Black









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