पत्थर, बीज और गोबर
हिस्से तो कुछ ना आया
सब कुछ तुमसे मिला
मुझसे कुछ ना पाया
जब रेत छानने बैठी तुम
मैं मिला पत्थर की तरह
फेक दिया समंदर में
फिर किनारे पे आया
जिस रेत को छाना जा रहा है
वो मेरा ही सृजन है
मैं रहा बीज की तरह
शरबत में तुम्हारे
जो रस मैंने दिया
उसी से तुमने छुड़वाया
निकाल फेका गिलास से
सुनो मुझमे फिर पौधा आया
जिस रस को पिया जा रहा है
वो मेरा ही सृजन है
गोबर रहा मैं घर में तुम्हारे
जगह पवित्र की और
बस मच्छरों को भगाया
बस मच्छरों को भगाया
परवाह नहीं जो अनंत काल तक
बस लीपा जाऊंगा
फिर भी वो सतह ऊँची नहीं होने दूंगा
दरवाजों को नहीं टिकने दूंगा ज़मीं से
बस तुम रौंदना बंद मत करना पाने पैरों तले
जिस ज़मीन को कुचला जा रहा है
वो मेरा ही सृजन है
पत्थर बीज और गोबर
फर्क बस दबने की जगह का है
रेत, मिटटी या बरामदा
ह्रदय स्पर्श या यूँ ही आमदा
Comments
Post a Comment