एक डॉक्टर की मौत (१९९०)



मौलिक विज्ञान के क्षेत्र में आधुनिक भारत का योगदान उँगलियों पर गिना जा सकता है, किन्तु किसी भी विधा के विज्ञान में हमारा इतिहास ही रहा जो अभी तक ज्ञात विज्ञान का आधार बना, और फिर समूचे विश्व ने इन विशाल पथ्थरों पर अपनी बड़ी बड़ी खोजों के महल बनाए। आर्यभट्ट, सुश्रुत, चरक कुछ लोकप्रिय उदहारण हैं, पर ऐसी हमारा इतिहास कई ऐसी मौलिक खोजों से भरा पड़ा है जिन्हे हमने पहले आधुनिक विज्ञान में किसी और नाम से जाना। श्री शिवकर तलपड़े के बारे में भी कई लोग तब जान पाए जब एक एक फिल्म ने उन्हें आधार बनाया, खैर



 
"एक डॉक्टर की मौत" चित्रण है एक साधारण MBBS डॉ की, जो कुष्ठ रोग (leprosy) का टीका (vaccine) बनाने का सपना देखता है, और काफी हद उसमे सफल भी होता है,  कहानी शुरू होती है डॉ दीपांकर रॉय (पंकज कपूर) और उनकी पत्नी (शबाना आज़मी ) की नोक झोंक से, शबाना चाहती हैं कि डॉ रॉय अपनी खोज के साथ अपना और घर का ध्यान भी रखें। लगभग ७ साल के अथक प्रयास के बाद डॉ रॉय वैक्सीन* बनाने में कामयाब होते हैं, पर अभी ये वेक्सीन केवल चूहों और बंदरों पर आज़माया गया है, एक मित्र पत्रकार (इरफ़ान खान) इसे स्थानीय समाचार पत्र में प्रकाशित करते हैं, जिसमे एक अवलोकन (observation) यह भी है कि ये वैक्सीन कुष्ठ रोग के साथ शायद बाँझपन (Infertility) का इलाज करने में भी सक्षम हो, यह केवल एक अवलोकन मात्र है ऐसा कोई दावा नहीं किया है डॉ रॉय ने।

बाँझपन के इलाज की खबर को कुछ यूँ प्रस्तुत किया जाता है कि जैसे डॉ रॉय उसी विषय पर काम कर रहे हों और कुष्ठ रोग पर नहीं। यह खबर डॉ रॉय को पूरे डॉ समुदाय में पुरजोर विरोध का सामना करवाती है, स्वास्थ्य विभाग भी उन पर षड्यंत्र रच उनका तबादला कलकत्ता से किसी गांव में कर देता हैं, जहाँ वो अपनी खोज जारी न रख पाएं ।

इसी बीच डॉ रॉय के मार्गदर्शक (guide) डॉ कुंडू (अनिल चटर्जी) उनका शोधपत्र एंडरसन फाउंडेशन, लन्दन भेज देते हैं, फाउंडेशन चाहता है कि डॉ रॉय अपना शोधपत्र लन्दन आकर पढ़ें, लेकिन स्वास्थ्य विभाग वह निमंत्रण पत्र डॉ रॉय तक पहुँचने नहीं देते, अंतत: एंडरसन फाउंडेशन अपने प्रतिनिधि को डॉ रॉय से मिलने भेजती है और फाउंडेशन के साथ काम करने का निमंत्रण भी, डॉ रॉय अपनी शासकीय सेवा से त्यागपत्र देते हैं, समूची मानवता और अपनी शोध पूरा करने ले लिए डॉ रॉय कलकत्ता से फाउंडेशन चले जाते हैं । यहाँ ये फिल्म ख़त्म होती है ।
हर समाज (या झुण्ड ) ने अपने नियम बनाए, और उन नियमों से आगे जाना केवल विद्रोह करार दिया जाता है जबकि नियम तोड़े नहीं गए, केवल नियमों से आगे सोचा गया, असली कुष्ठ रोग है वह केकड़ा मानसिकता है जो हर आगे बढ़ने वाली विस्तृत सोच को उसी मर्तबान में खींचने की कोशिश करती है, पर ये हर उस जज़बे को रोक पाती तो हमारा समाज इतना विकसित और सभ्य कभी न हुआ होता। जिन गलियों के आगे मैदान हुआ करते हैं उन गलियों में कोई नहीं खेलता, वो सिर्फ जरिया हैं मैदान तक पहुंचने का, समाजवाद भी यही कहता है।

फिल्म का हर दृश्य आपको जगाता है, एक दृश्य में डॉ कुंडू अपना शरीर डॉ रॉय को देने की बात कहते हैं ताकि वैक्सीन का मानव पर भी परिक्षण हो सके, और ऐसे कई सारे,  फिल्म के दृश्य दिखने में अत्यन्त साधारण हैं पर बेहद कामगर हैं, और बिना किसी अतिरिक्त प्रकाश व्यवस्था के ही शूट किये गए हैं, वर्ना १९९० में ऐसी कोई कमी नहीं थी, आप समकालीन फ़िल्में देख सकते हैं। पंकज कपूर का अभिनय सभी पर भारी है, कई जगह वो सीमायें लांघते नज़र आते हैं, एक शोधकर्ता की इस तंत्र से लड़ाई देखते बनती है। "नीम का पेड़" यदि आपको पसंद आया था तो ये फिल्म देखिये, केवल पंकज कपूर के लिए.

यह फिल्म कुछ हद तक डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय के वास्तविक जीवन पर आधारित है, जिनका IVF (in-vitro fertilisation) के क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान है,  निर्देशन तपन सिन्हा का है, संगीत वनराज भाटिया का,  और पुरे प्रोजेक्ट को NFDC ने फंड किया है।



* वैक्सीन मतलब टीका, जान बूझकर प्रचलित शब्द प्रयोग किया गया है।















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