हज़ारों ख्वाइशें ऐसी (२००५)


इस फिल्म देखते देखते एक बात तो पुख्ता कर लेंगे आप कि जिसने भी लिखी है बनाई है इमरजेंसी बड़े पास देखी है उसने, और क्यों न हो सुधीर मिश्रा का रिश्ता राजनीति से बड़ा गहरा है या यूँ कहूं कि खून का है.. 




फिल्म लगभग शुरू होती है हिन्दू कॉलेज के लड़के सिद्धार्थ तैयबजी (के.के. मेनोन) के लेटर से, जो उसने अपनी दोस्त गीता (चित्रांगदा सिंह) को लिखा है, उसमे उसने नक्सलवाद, जातिवाद जैसे शब्दों के साथ देश के वर्तमान हालात पर चिंता व्यक्त की है, १९७० का समय है,  वो दौर था जब हर पढे लिखे जिसकी सोच उतनी विकसित हुई जितनी उसकी उसकी पीढ़ी में किसी की न थी, इसी बीच विक्रम जो एक गांधीवादी अमीर परिवार का लड़का है, गीता के लिए उसका आकर्षण भी कुछ कम नहीं। बाकि पात्रों का परिचय बस आपके और मेरे समय की बर्बादी है । 




कहानी इतनी सी है, आदर्शवाद और वास्तविकता में फसा नायक सिद्धार्थ तात्कालिक नक्सलवादी आन्दोलन को समर्थन देने बिहार जाता है, गीता भी उसका साथ  देती है, किसी षड्यंत्र में फस जाने पर ये विक्रम से मदद मांगते हैं, और विक्रम बिहार आ कर वहीँ का हो जाता है,  क्योंकि विक्रम को किसी भूलवश बुरी तरह पीटा जाता है जिससे वो दिमागी संतुलन खो देता है  जबकि सिद्धार्थ आंदोलन के बीच मेडिसिन पढ़ने लन्दन चला जाता है । अब गीता सामाजिक लड़ाई के अलावा स्कूल में पढ़ाती है और विक्रम की देखभाल करती है, सिद्धार्थ ने वचन दिया है कि वह लौटेगा । ७० के दशक का हर बदकिस्मत शिक्षित यौवन कैसे कुचला गया, ये बस बानगी है ।   



अलसी चमत्कार इस छोटी सी कहानी के पटापेक्ष में घटती घटनाओं में है, जातिवाद और नक्सल आंदोलन में चपेट में पड़ा बिहार अंतत: इमरजेंसी नाम की चिंगारी को पैदा करता है फिर पूरा देश उस यथार्थ की ज्वाला में अपनी अग्नि परीक्षा देता है ।  
 यदि आपने स्वतंत्रता के बाद का इतिहास पढ़ा है जो की अमूमन स्कूल की किताबों में पढ़ाया नहीं जाता है तो आप जानेंगे कि कितनी वीरता से बनाई गयी होगी फिल्म, इसमें बड़े बड़े नेताओं और उनकी शैली को ज्यों का त्यों उकेरा है सुधीर ने, एक दृश्य में राजस्थान के एक किले के सौदे को चित्रित किया गया है, कमाल किया है, अपनी मिटटी गँवा के जो पथ्थर जोडा फिर वो कागजों में बिका, न्याय और व्यवस्था के जो हालात दिखाए गए हैं वो विचलित कर देते के लिए पर्याप्त हैं, मुझे यकीन है अब स्थिति बदली होगी।

ज्यादा और कुछ लिखने के लिए है ही नहीं, या शायद आपका अनुभव चरम पर ही रखना ठीक समझता हूँ, जरूर देखिये, बहोत सार्थक सिनेमा है । बैकग्राउंड में शांतनु मोइत्रा लाजवाब हैं,  ये फिल्म "रेणु सलूजा" को समर्पित है, बड़ी बहादुर महिला रही होंगी, उनके बारे में फिर कभी लिखूंगा । 




बांवरा मन देखने चला एक सपना .....     

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