आज सलाम बॉम्बे देखी, मुझे आश्चर्य होता है कि ऐसी सटीक फिल्म कैसे लोकप्रिय नहीं हो पायी, मीरा नायर की कहानी पर डॉ. सुब्रमण्यम का संगीत हर दृश्य पे आपको हतप्रभ छोड़ जाता है, और छोड़ जाता है कई प्रश्न, जिनके उत्तर आपको फिल्म के अंत तक नहीं मिलते, वो उत्तर शायद आपको अपने अंदर या दुनिया से बहार ही खोजने होंगे ।
कृष्णा बड़े शहर का टिकिट लेकर बम्बई पहुँचता है, और वहां उसकी मुलाकात चिल्लम (रघुवीर यादव) और उसके साथियों से होती है, चिल्लम ड्रग्स बेचने का काम करता है और रोज पी भी लेता है, "चायपाव" अब कृष्णा का नया नाम है, और वो सामने की चाल में और आसपास के इलाकों में चाय पहुंचाता है, चाल में बाबा (नाना पाटेकर) भी रहता है जिसने एक वैश्या रेखा (अनीता तंवर) को अपनाया है और उससे उसे एक बेटी मंजू (हंसा विठल) भी होती है , बाबा चिल्लम का बॉस है, याने चिल्लम को बेचने के लिए माल बाबा ही देता है. उसी चाल में एक मौसी रहती है जो वैश्यावृति में लिप्त है और यही करना करवाना उसका धंधा है, वही एक कुंवारी कन्या को लाया जाता है, चायपाव याने कृष्णा का नया आकर्षण अब वो नयी लड़की है, जिसे वो "सोला साल" नाम देता है।
कृष्णा का लक्ष्य बस ५०० जमा कर घर वापस जाना है, जिसका सही पता उसे नहीं मालूम, वो बस यह जानता है कि वो कहीं बंगलौर के पास है, उसे घर से निकाल दिया गया है क्योंकि उसने अपने सौतेले बाप की स्कूटर जला दी है, इसी उधेड़बुन में कहानी आगे बढ़ती है, वो अपने घर किसी (इरफ़ान खान) से चिट्ठी भी लिखवाता है, कभी वेटर तो कभी पोछे वाला बन के कृष्णा की ज़िंदगी आगे चलती है, एक बार वो "सोला साल" को भागने की कोशिश में बुरी तरह पिट भी चुका है, अब बाबा सोला साल का नया आशिक़ है ।
किसी बात पर बाबा और चिल्लम में लड़ाई हो जाती है और चिल्लम की सप्लाई भी बंद हो जाती है, चिल्लम ड्रग्स न मिलने पर एक दिन दम तोड़ देता है और साथ ही कृष्णा का सपना, एक चिल्लम ही था जो उसे घर जाने के लिए प्रेरित करता था, बम्बई में कई लोग ऐसे ही मरते हैं जिनका कोई अपना नहीं, जिनका कोई पता नहीं ।
समोसे चुराने के इल्जाम में कृष्णा और मंजू को जेल और फिर बालसुधार गृह भेज दिया जाता है, जहाँ से वो भागकर कर सोला साल के पास जाता है और वो उसे बताती है कि वो बाबा के साथ भाग जाने वाली है, बाद में उसे किसी और के पास भेज दिया जाता है और कृष्णा बाबा की हत्या कर देता है, उसके दोस्त और प्रेम का हत्यारा बाबा ही है। मंजू को उसकी माँ बालसुधार गृह में ही रखना पसंद करती है और कृष्णा के साथ चलने का फैसला करती है, पर नियति उन्हें भी अलग कर देती है, यहाँ ये फिल्म समाप्त होती है ।
एक अबोध बालक की दुनिया और खुद के साथ लड़ाई काफी मार्मिक और वास्तविक है, घर की सीमा के बहार दुनिया शायद उतनी ही बेरहम है, बम्बई अब मुंबई बन चुका है और कृष्णा का किरदार निभाने वाला शफीक जिसने १९८९ का फिल्मफेयर अवार्ड जीता, आज ऑटो चलाता है, बाकि सभी कलाकार खुद को स्थापित कर चुके हैं । कुल मिलाकर एक बेहतरीन फिल्म, सलाम मीरा ।

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