सुबह की बौराई नींद,
खिड़की से झाकते - सूरज की पूँछ से
लुक्का छिप्पी खेलते खेलते
गिर आती है बिस्तर पर
तकिया
तुम्हारी यादों से गीला रहता है
और आंखें
तुम्हारे इश्क के इत्र से
ऋषिकेश वाली गंगा जैसी लब-लबाई रहती हैं
नींद को फ़ुसला कर तो भेज देता हूँ
बच्चों की तरह
सूरज की रौशनी के साथ साथ
तुम्हे कैसे बहलाऊ
इतनी दूर बैठी हो, और
मानती भी नहीं
कि
मेरी सांसें हर रोज़ लिखती हैं
तुम्हारे लिए एक नया 'Love Letter'
अब,
चिट्ठी में क्या लिखूं, बस ... 'GOOD MORNING'
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