हाँ मैं वही हूँ, लेकिन अब नहीं हूँ।
किस्सा नहीं हूँ कहानी भी नहीं
पहेली तो बन सकता भी नहीं
एक अनसुनी हूँ अनकही हूँ
हाँ मैं वही हूँ...
चारपाई पे आराम हूँ
बिना काम की शाम हूँ
अनचाहा मक़ाम हूँ
सोने का मर्तबान हूँ 1
जैसे हवा अनबही हूँ
हाँ मैं वही हूँ...
शहर हूँ जहाँ जाना मुश्किल
चाँद हूँ मगर पाना मुश्किल 2
देख लो मगर छूना नाकारा
कितना शरीफ पर कितना आवारा
जैसे नुमाइशी सुराही हूँ
हाँ मैं वही हूँ...
आचार हूँ सब्जियों के सामने
नमक हूँ जिंदगी में तुम्हारी 3
हाँ मैं वही हूँ...लेकिन अब नहीं हूँ ।
1. सोने का मर्तबान इसलिए हूँ क्योंकि वो किसी काम का नहीं होता, बस रखा रहता है किसी सुरक्षित से स्थान पर .. उससे बेहतर तो चीनी या कांच के बर्तन, किसी कम तो आते हैं ।
2. चाँद सर्वसुलभ है पर इन्हें नहीं मिल सकता ।
3. उतना खाओ जितना पचा सको ।
( मुश्किल प्यार करना , मुश्किल उसे निभाना उससे मुश्किल उसे गवाना, सबसे मुश्किल प्यार से उबरना ...)
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