कभी देखा है साफ़ आसमान..
कभी देखे हैं इतने तारे ..
कभी देखा है दाग है चंदा मामा पे,
कभी झूले हो , नीम है जहाँ पे,,
नहा कर देखो कभी नदी में,
जाकर देखो कभी उस सदी में,,
कभी खच्चर की करो सवारी,
कभी सहलाओ अपनी गाय प्यारी,,
आज सायकल क्या मिली हर तरफ बहार है,
वैसे इसके बिना भी हम हवा के यार हैं,,
कंचे नहीं हैं ये , दौलत हमारी है,
लट्टू सी घुमती ये दुनिया बेचारी है,,
बेवजह खेतों में भाग जाओ कभी,
बिना देखे डबरे में छलांग लगाओ कभी,,
कभी देखा है साफ़ आसमान..
कभी देखे हैं इतने तारे ..
( बचपन , बचपन है.. जिंदगी का ऐसा हिस्सा जो बिन मांगे ही मिल जाता है, बाकि सारे हिस्से तो मांगने पड़ते हैं.. यही है जो सर्वोत्तम है और बिन मांगे मिलता है .. परमपिता का additional गिफ्ट .. जीव शक्ति के साथ
अभी ही घर से लौटा हूँ महानगर में , वैसे घर इस महानगर में भी है पर मेरा मन वहीँ लगता है जहाँ मेरा बचपन बीता , कभी-कभी तुलना करता हूँ अपने खेले हुए खेलो की इन बच्चो से जो यहाँ पले-बढ़े, रोज देखता हूँ उन्हें उनके घर की बाल्कनी में खेलते हुए , 10x10 की जगह में अपना संसार बनाते हुए..
अभी ये कविता उन मिटटी के शेरो के लिए जिनके लिए कोई सीमा नहीं है जगह की , मस्ती करने के लिए सारा संसार भी कम है, ये गुदड़ी के लाल चाँद को भी रंग लगाने की कोशिश में हैं.. )
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